उनतालीस साल पहेले लड़ी आज़ादी की लड़ाई याद आती है,
नफ़रत की आग मे झुलसी गलियों की सूनता याद आती है,
उन्हें दिल्ली की गली नमंबर ६, और हमे लाहौर की सर्दियाँ याद आती है।

छोड़ देते हैं लोग जीना बस एक उम्र के बाद
मगर ये ज़िन्दगी जीना नहीं छोड़ा करती
बनाये रखती है रिश्ता हर एक साँस के साथ
इतनी आसानी से रिश्ता नहीं तोड़ा करती।

बेवजह के जुनून में ये खोई ज़िन्दगी
एक आह सी सुनी तो लगा रोई ज़िन्दगी
दुआओं में उठते हैं हमेशा ये मेरे हाथ
नाकाम और बरबाद न हो कोई ज़िन्दगी।

कोशिश को हमारी बस एक इशारा चाहिए
हम चल पड़े हैं थोड़ा सा सहारा चाहिए
यूँ तो बहुत तूफ़ानों के आसार है आगे
कोशिश की इस कश्ती को किनारा चाहिए।

दिल को ख़ुशियाँ दिये एक ज़माना हुआ
ज़िन्दगी को जिये एक ज़माना हुआ
नाज़ नख़रे अब अपने उठा लूँ ज़रा
इश्क़ ख़ुद से किये एक ज़माना हुआ।