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Thursday, May 3, 2012

फील गुड का एहसास.



जी हाँ जनाब यह एक ऐसा एहसास है जो अक्सर लोगों को कुछ खास पसंदीदा काम करने में आता है. नेक इंसान को किसी की मदद करने में फील गुड का एहसास होता है तो बुरे इंसान को लूट,चोरी,बुराई इत्यादि बुरे काम करने में यह एहसास पैदा हुआ करता है.

आज के समाज में इंसान अकेलेपन का शिकार होता जा रह है. यह सत्य है की महानगरों में व्यस्त जीवन के कारण इंसान अकेलेपन का शिकार हुआ करता है लेकिन व्यस्तता अकेले ही इसका कारण नहीं. आज के रिश्तों में ईमानदारी की कमी, दिखावा, खुदगर्जी ओर मौकापरस्ती भी लोगों के अकेलेपन  का एक बड़ा कारण है. आज एक इंसान अपने जैसे किसी दुसरे इंसान से अपना दुःख दर्द बांटते हुए डरता है क्यों की मदद मिलने की जगह बेईज्ज़ती होने की आशंका अधिक हुआ करती है. आज के युग में वोह खुशकिस्मत है  जिसे भरोसेमंद ईमानदार दोस्त रिश्तेदार ओर मददगार पड़ोसी मिल जाए.

ऐसे समाज में रहने वाला इंसान अब आभासी दुनिया का सहारा अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए लेने लगा है . सोशल वेबसाईट की कामयाबी का राज़ भी यही है की अकेलेपन के  मारे इस इंसान को वहाँ जा के फील गुड का एहसास होता है. जहां इस समाज में एक दोस्त बना पाना मुश्किल हुआ करता है वहीं इन सोशल वेबसाइटों पे वो हजारों मित्र बना लेता है ओर उनसे बातें कर के अपने लेख तसवीरें इत्यादि दिखा के खुश हो लेता है. गौर ओ फ़िक्र की बात यह है की यदि हर इंसान इस समाज में फील गुड के एहसास को पा लेना चाहता है तो ऐसी क्या मजबूरी है की उसे वास्तविक दुनिया से आभासी दुनिया की ओर रुख करने पे मजबूर होना पड़ रह है?

कहीं न कहीं यह हम सब की ही एक बड़ी कमी है और इसे दूर करने के लिए हम सभी को अपने रिश्तों में ईमानदारी लानी होगी और अपनी  सामाजिक ज़िम्मेदारियों को भी ईमानदारी से निभाना होगा.

8 comments:

Khushdeep Sehgal said...

मासूम भाई, ​

इतने लंबे ब्रेक नहीं लिया कीजिए...आप के रहने से ब्लाग-जगत का माहौल सुधरा रहने में बहुत मदद मिलती है...​
​​
​जय हिंद...

महेन्द्र मिश्र said...

आदमी वहीँ तो जाता है जहाँ पर उसे फील गुड का अहसास हो ... सारगर्वित प्रस्तुति ... आभार

Dr. Ayaz Ahmad said...

duniya ke rang nirale hen.

achhi post.

एस.एम.मासूम said...

खुशदीप भाई ब्रेक लेने के पीछे एक करण यह भी है कि डरता हूँ लंबी रेस में कहीं मुझ पे ही ज़माने का असर न होने लगे और माहौल खराब करने में सहयोगी जाने अनजाने में बन जाऊँ |

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आज चार दिनों बाद नेट पर आना हुआ है। अतः केवल उपस्थिति ही दर्ज करा रहा हूँ!

अजय कुमार झा said...

सच कहा आपने मासूम भाई , जैसा जैसा अहसास होगा वैसा वैसा ही महसूस होगा । इसलिए अच्छा अच्छा फ़ील किया जाए । सुंदर सकारात्मक पहलू जिंदगी का ।

नीरज गोस्वामी said...

कहीं न कहीं यह हम सब की ही एक बड़ी कमी है और इसे दूर करने के लिए हम सभी को अपने रिश्तों में ईमानदारी लानी होगी और अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों को भी ईमानदारी से निभाना होगा.

सच्ची और अच्छी बात कही है आपने

नीरज

Dr. Dilip K Singh said...

बढ़िया लिखा है |