lifestyle अगले जनम मोहे बिटिया नहीं कीजों | अमन का पैग़ाम
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औरत माँ है बेटी है पत्नी है पूज्य है, जहां पर नारी का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं " यत्र नारी पूज्यंते, रमंते तत्र देवता "लेकिन  इन  सबका   क्या अर्थ हुआ यदि किसी  समाज में महिलाओं को उनके जीवन की सही आज़ादी से वंचित किया जा रहा हो?


नारी और पुरूष में प्राकृतिक भिन्नताएं हैं इसी कारण से नारी पुरुष सामान   नहीं लेकिन बराबरी का दर्जा मिलना ही चाहिए और कहीं कहीं तो नारी को पुरुष से भी ऊंचा स्थान देना चाहिए. धार्मिक किताबों मैं भी बहुत सी जगहों पे नारी को पुरुष से ऊंचा स्थान दिया गया है.

यदि वही उच्च स्थान केवल किताबों में ना रह के हकीअत में दिया जाता तो आज हमारे समाज में जो दुर्व्यवहार  स्त्रीयों के साथ होता है ,ना हो रहा होता. स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक है और एक दूसरे को साथ रहने मैं सुख की प्राप्ति होती है. ऐसे मैं महिला एक इंसान ना रह के भोग की वस्तु कब और कैसे बन गयी इस बारे मैं हमारे आज के समाज को अवश्य सोंचना चाहिए.

महिलाओं को भी इस बात पे विचार करने की आवश्यकता है की मर्द की बराबरी और आज़ादी के सही मायने मैं क्या अर्थ हैं.  औरत का शरीर मर्द से अलग है उसके पहनावा अलग है.  मर्द की तरह पैंट शर्ट को पहनना आज़ादी नहीं, अर्धनग्न वस्त्रों को पहन के खुद को भोग की वस्तु बना लेने पे मर्द को मजबूर करना  आज़ादी नहीं बल्कि आज़ादी है अपनी ख़ुशी से अपना जीवन साथी तलाश करना, दहेज़ को शादी मैं रुकावट  ना बनने  देना  ,पुरुष के जैसे ही शिक्षा हासिल  करना , घर के फैसलों मैं आप की बात को भी अहमियत दी जाए इस बात की कोशिश करना.

लड़की गर्भ मैं आयी  तो डर कि गर्भ मैं ही उसकी हत्या ना कर दी जाए. सवाल यह उठता है की क्या यह काम मर्द करता है और औरत जिसके गर्भ मैं लड़की है मजबूर होती है भ्रूण हत्या करवाने के लिए या एक औरत भी नहीं चाहती की उसकी औलाद एक बेटी हो? दूसरा बड़ा सवाल है कि जब यह मर्द औरत एक दूसरे को सुख ही देते हैं तो क्या कारण है कि औरत कि भ्रूण हत्या कर दी जाए? क्या नुकसान कोई माता पिता को उसके जन्म से होता है?  कहीं दहेज़ इसका कारण तो नहीं?    और अगर यह भी एक कारण है तो इसे बदलने कि कोशिश क्यों नहीं कि जाती? इसी बदलना ,भ्रूण हत्या से बेहतर  है

जब पढ़ाई का समय आया तो बेटे की पढ़ाई पे अधिक ध्यान दिया जाने लगा और बेटी को दूसरे नम्बर पे रखते हुए , उसी दूसरे की अमानत समझते हुए उसकी शादी की फ़िक्र की जाने लगी. यह फैसला अभी माता पिता दोनों मिल कर लेते हैं.

बेटी जवान हुई तो गली मोहल्ले के मर्दों का डर यहाँ तक की बड़े बूढों से , मर्द रिश्तेदारों से भी खतरा. एक कैदी बन के रह जाती है एक जवान औरत की ज़िंदगी. यहाँ फिर एक सवाल की क्यों मर्द परायी स्त्री का मोह नहीं त्याग पाता? और मजबूरन औरत को एक कैदी की ज़िंदगी जीने पे मजबूर होना पड़ता है.

नौकरी  की तो दफ्तरों मैं लालची नज़रों का सामना, सहयोगी अफसरों द्वारा औरत को अपनी वासना का शिकार बनाने की कोशिशें. शादी हुई तो सास का खौफ, पति की जी हुजूरी करना. दूसरों की ख़ुशी के लिए औरत के फैसले उसकी ख्वाहिशें दब के रह जाया करती हैं .विधवा हो गयी तो तिरस्कार, मनहूस की डिग्री ,दोबारा शादी करने की आज़ादी नहीं. 

जब की यही औरत जब माँ बनती है तो औलाद को उससे अधिक मुहब्बत देने वाला कोई नहीं होता. औलाद के लिए भी उसकी माँ की जगह कोई नहीं ले सकता. बहुत बार देखा गया है की बेटी जितना अपने माता पिता का ख्याल रख लेती है बेटा नहीं रख पाता. औलाद की परवरिश, उसकी तरबियत अगर एक माँ सही ढंग से ना करे तो वो औलाद जिसपे मर्द फख्र करता है की उनकी निशानी है उसका वंश चलाएगी , बर्बाद हो जाए और बंश पे भी दाग़ लग जाए.

ज़रा ध्यान  से देखें माँ की ममता, पत्नी का प्यार, बहन और बेटी का सहयोग इस मर्द को जीवन मैं शक्ति प्रदान करता है और वंही दूसरी और यही नारी एक कैदी सा या एक वैश्या सा जीवन बिताने पे मजबूर की जाती रही है.हद तो यह है कि पत्नी के रूप मैं भी पति द्वारा बलात्कार क़ी शिकार होती है और चुप रहने पे मजबूर होती है.

कुछ सवाल हैं जिनका जवाब हमको ही तलाशना होगा.

हमारे समाज मैं नारी के इस हाल के लिए कौन ज़िम्मेदार है?  सही मायने मैं एक औरत की आज़ादी किसे कहते हैं? जब हमारे जीवन की गाडी नारी के सहयोग के बिना नहीं चल सकती तो यह नारी इतनी कमज़ोर क्यों? जब हमारे धर्मो मैं कहा गया है की जहां पर नारी का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं तो फिर इस नारी की आँखों मैं  डर और आंसू  क्यों?

जिस दिन हमारा समाज नारी को उसकी सही जगह देना सीख लेगा उसे भोग की वस्तु की जगह एक इन्सान , ममता की देवी मानते हुई उसका सम्मान करना सीख लेगा उस दिन शायद महिलाएं भी अपनी सही आजादी का अर्थ समझ ने लगेंगी और एक ऐसा समाज सामने आएगा जहाँ औरत की आँखों मैं डर और आंसू की जगह ख़ुशी और चेहरे पे बेशकीमती मुस्कराहट देखने को मिला करेगी.और उसके चेहरे क़ी यही मुस्कराहट मर्द का जीवन है

About S.M Masum

BSc.(Chem) रिटायर्ड बैंकर(ब्रांच मैनेजर, उनका जो फ़र्ज़ है वो अहले सियासत जानें, मेरा पैग़ाम मुहब्बत है जहां तक पहुंचे - जिगर मुरादाबादी. ब्लॉगर की आवाज़ बड़ी दूर तक जाती है. इसका सही इस्तेमाल करें और समाज को कुछ ऐसा दे जाएं, जिससे इंसानियत आप पर गर्व करे। यदि आप की कलम में ताक़त है तो इसका इस्तेमाल जनहित में करें..
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