इधर लगातार २-३ लेख मैंने महिलाओं पे हो रहे ज़ुल्म के कारणों का विश्लेषण करते हुए लिखे और हर प्रकार की संभावनाओं पे अपनी बातें आप सभी के सामने रखी. सहमती असहमति के बीच से होता हुआ कुछ विवादों मैं भी घिरा लेकिन ब्लॉगर का सहयोग मिलता रहा और उनके विचारों और पोल के नतीजे सच्चाई को बयान करते रहे.
यौन हिंसा के बहुत से कारण हैं जिनका मैं ज़िक्र क्र चूका हूँ उसमें से एक महिलाओं के उत्तेजक वस्त्रों को भी माना जा रहा है. . कई जजों और पुलिस अधिकारिओं ने भी इस बात को स्वीकार है लेकिन इस बात को अस्वीकार करते हुए कल महिलाओं ने टोरंटो, लंदन और सिओल की नकल करते हुए वैसा ही दिल्ली मैं इंडिया का पहला स्लटवॉक! बेशर्मी मोर्चा निकाला.
सबसे पहला सवाल यह उठता है की यह मोर्चा केवल पुरुषों के ही खिलाफ क्यों? क्या हिंदुस्तान मैं ऐसी महिलाओं, माओं की कमी है जो अपनी बेटियों को उत्तेजक कपडे पहन के जिस्म की नुमाईश करने से रोकती हैं और ऐसे पहनावे को यौन हिंसा का ज़िम्मेदार मानती हैं?क्या ऐसी युवतीओं की कमी है जो किसी लड़की को मिनी या मिडी मैं देख के यह कहती हैं की लगता है इसके बहुत से बॉय फ्रेंड होंगे?
मुझे तो लगता है की यह प्रदर्शन दर असल हिन्दुस्तानी सभ्यता और संस्कृति को औरतों पे ज़ुल्म का ज़िम्मेदार मानते हुए उसके खिलाफ था और मकसद पश्चिमी सभ्यता को हिंदुस्तान मैं लाने की हिमायत करना थी . क्या हमारे हिन्दुस्तान कि सभ्यता महिलाओं पे ज़ुल्म और बलात्कार सिखाती है और पश्चिमी सभ्यता औरतों कि इज्ज़त करना?
पुराने वक़्त मैं बलात्कार और औरतों पे ज़ुल्म बड़ी उम्र के मर्दों कि दबंगई के नतीजे मैं हुआ करते थे जो आज भी देखने को मिलते है लेकिन आज यह कमसिन नौजवानों मैं भी देखने को मिलने लगा है और इसकी शिकार अक्सर ४-६ वर्ष कि बच्चियां भी हो जाया करती हैं. यह नौजवान शायद इसी आज़ाद पश्चिमी सभ्यता, पोर्नोग्राफी ,अश्लील फिल्में गाने और उत्तेजक वस्त्रों को देख देख के अपना कण्ट्रोल को दिया करते हैं.
कुदरत ने नर और मादा चाहे वो पेड़ पौधे हों , जानवर हो या इंसान को ऐसा बनाया है की दोनों को एक दुसरे के प्रति आकर्षण देख के ही पैदा होता है. और यही आकर्षण सहमती होने पे सेक्स मैं बदल जाता है. इस आकर्षण को तो ख़त्म करना संभव नहीं और जब किसी स्त्री का शरीर खुला दिखता है तो मर्द का उसे देखना कोई अजीब सी बात नहीं. होना तो यही चाहिए की मर्द औरत पे चाहे वो उत्तेजक कपडे ही क्यों ना पहने हो बार बार नज़रें ना डाले लेकिन महिलाओं को भी उत्तेजक कपडे नहीं पहनने चाहिए इस सच्चाई को कुबूल करते हुए की उनका का जिस्म मर्द के लिए और मर्द का जिस्म औरत के लिए आकर्षण का कारण हुआ करता है.
फिल्मो के गरमा गर्म गाने में हिरोइन या डांसर उत्तेजक कपड़ों मैं पेश ही इसी लिए की जाती हैं की फिल्म को अधिक से अधिक लोग देखें. क्या इस स्त्री पुरुष के आपसी आकर्षण को ख़त्म करना संभव है और यदि ऐसा हो गया तो क्या होगा?
आज कल समलैंगिक एक तरफ मोर्चे निकालते हैं और अपनी आज़ादी के नाम पे स्त्री कि जगह पुरुषों से ही काम चला लेते हैं वंही दूसरी तरफ महिलाएं कहती हैं हमें ना देखो. कहीं ऐसा हो गया कि पुरुषों ने महिलाओं कि जगह पुरुषों को ही देखना शुरू कर दिया तो नज़ारा क्या होगा. यकीन जानिए इन महिलाओं मैं से ७५% सजना संवारना बंद कर देंगी. जब किसी को उनका जिस्म देखने लायक लगता ही नहीं तो क्यों खुला रख के बाज़ारों मैं घूमना?
बराबरी के अधिकार के नाम पे वो दिन भी दूर नहीं दिखते जब पत्नियाँ पति से कहेंगी मेरा जिस्म तेरे बाप का घर नहीं की तेरी औलाद को ९ माह गर्भ मैं रखूँ. बच्चों को दूध पिलाना तो धीरे धीरे कम होता जा रहा है क्यों कि इस से उन महिलाओं का फिगर खराब हो जाता है.
महिलाओं के साथ ज़ुल्म केवल सड़कों पे नहीं होते बल्कि पति के घर पे भी ज़ुल्म हुआ करता है और उसकी मर्ज़ी के खिलाफ सेक्स जिसे बलात्कार कहा जाता है हुआ करता है. महिलाओं के साथ पतियों द्वारा मार पीट जैसे अपराध भी घरों मैं आम हैं. आज के समाज मैं औरत की शादी हो जाने के बाद वो अपने मैके के लिए भी परायी हो जाती है, तलाक ले ले तो भी अकेले रहना समाज दूभर केर देता है तरह तरह के लांछन लगाये जाते हैं ऐसे मैं मजबूर औरत घर मैं ही पति से बलात्कार करवाने और मार खाने को मजबूर होती है. इसके लिए कौन मोर्चा निकालेगा और कब? और यदि बेशर्मी मोर्चा निकल भी जाए तो क्या यह इस समस्या का समाधान होगा?
मोर्चे निकलना है तो यौन हिंसा, महिलाओं के साथ हो रहे ज़ुल्म के खिलाफ निकालो ना कि आज़ादी के नाम पे उत्तेजक कपडे पहनने कि मांग को ले कर मोर्चा निकालो. ऐसे बेशर्मी मोर्चे से हिन्दुस्तान की अधिकतर महिलाएं भी सहमत नहीं आप को यदि यकीन ना हो तो आस पास कि महिलाओं से बातें करें आप को सभी कहेंगी ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने का यह तरीका सही नहीं और यह समस्या का हल भी नहीं.
ख़बरों के अनुसार यह बेशर्मी मोर्चा सफल नहीं रहा क्योंकि इसमें ४०० पुलिस वाले २०० मीडिया वाले और १०० आम जनता और भाग लेने वाले शामिल थे. बीबीसी हिंदी ने अपनी रिपोर्टिंग मैं बताया कि जंतर-मंतर में बेशर्मी मोर्चा प्रदर्शन के ठीक बगल में ही सड़के के किनारे पनवारी लाल और सुमन ने एक छोटा सा झोपड़ा खड़ा किया है, जहाँ पिछले कुछ महीनों से वो अपनी छह साल से गायब बेटी लक्ष्मी को ढूँढ़ने के लिए प्रशासन के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.
उनके पास ना ही मीडिया का साथ है, ना ही प्रदर्शनकारियों की फ़ौज. बस बेटी की छोटी सी तस्वीर बाहर टाँग रखी है
सवाल उठता है कि इस यह गरीब की बेटी लक्ष्मीको तलाशने के लिए कौन सी महिलाएं मोर्चा निकालेंगी और कब?
यह सच है कि महिलाएं यदि उत्तेजक कपडे भी पहनती हैं तो भी पुरुषों को उनको बेईज्ज़त करने का, उनपे भद्दे कमेन्ट करने का या बलात्कार का लाइसेंस नहीं मिल जाता इस्लाम मैं भी पर नारी परदे मैं हो या बेपर्दा पहली नज़र के बाद दूसरी नज़र डालना पाप कहा जाता है लेकिन महिलाओं को भी उत्तेजक कपडे पहन कर पुरुषों को आकर्षित करने से बचना चाहिए. क्यों की ताली दो हाथों से ही बजती हैं.
वैसे भी उत्तेजक कपड़ों के बावजूद ९९.९% पुरुष नज़र से चाहें देख लें बलात्कारी नहीं होते. अपराध रोकने के लिए अपराधी को सजा के साथ साथ उसके कारणों को भी ख़त्म करना होता है. चोरी रोकनी हैं तो चोरों को सजा दो लेकिन साथ साथ पहरेदार बिठाओ और घरों मैं ताले भी लगाओ.
भारतीय सभ्यता और संस्कृति यौन हिंसा का पाठ नहीं पठाती बल्कि महिलाओं कि इज्ज़त करना सिखाती है यह हम है जो दूसरों कि सभ्यता जहां ना माँ कि इज्ज़त है ना बहन ,जहां स्त्री के जिस्म का इस्तेमाल व्यापार और ताल्लुकात बढ़ाने के लिए किया जाता है उसे अपनाने की हिमायत करने लगे है.


32 comments:
रमज़ान की मुबारकबाद और अच्छे आलेख के लिए बधाई. लेकिन देखा है कि यह विषय निष्कर्षहीन ही रहता है. आपका प्रयास सराहनीय.
"भारतीय सभ्यता और संस्कृति यौन हिंसा का पाठ नहीं पठाती बल्कि महिलाओं कि इज्ज़त करना सिखाती है"
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यही सबसे बेहतर कमेंट होगा, इस पोस्ट के लिए!
यह ठीक है कि सिर्फ वस्त्रों के कारण ही स्त्रियाँ बेइज्जत नहीं होती फिर भी पहनावे में शालीनता होनी चाहए , ...भारतीय परंपरा अनुसार ऐसे किसी वॉक को उचित नहीं मानती , विरोध प्रदर्शन के और भी तरीके हो सकते हैं !
एक बार फिर से बढ़िया विश्लेषण .भारतीय सभ्यता का दोष नहीं. हमें अपनी कमियों को दूर करना होगा . आभार
भूषण @ जी मैंने यह जो ३-४ लेख लिखे उसका नतीजा धीरे धीरे सामने आता जा रहा है. हममें से अधिकतर इस पश्चिमी सभ्यता को अपनाने को तैयार नहीं हैं और साथ साथ यौन हिंसा को रोकना भी सभी चाहते हैं. लेकिन समझ नहीं पा रहे हैं कि कैसे? यकीनन पश्चिमी सभ्यता को अपना के तो यह संभव नहीं होगा.
हाँ प्रयास करना अपना काम है और वो जो ऐसे मुद्दे पे अपने विचार खुल के नहीं रखना चाहते इस डर से कि कहीं किसी ब्लॉगर कि टिप्पणी उनके ब्लॉग पे बंद ना हो जाए वो भी इसे पढ़ते हैं और यकीनन कोई फ़िक्र ले के ही जाते हैं.
आपने बढ़िया विश्लेषण किया है। संक्रमणकाल का ही यह नतीज़ा है। हमें सतर्क रहने की आवश्यकता है नकल की तहजीब छोड़कर
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
अवगत कराइयेगा ।
http://tetalaa.blogspot.com/
अर्थपूर्ण सुन्दर प्रस्तुति
सटीक लेखन ।
massom ji,
aaj phir aapke blog par gayaa dekhaa or sochaa, baat kuchh aage badai jaaye. aap lagaataar chhote kapdo kee baat karte jaa rahe hai par hamare samaj kaa nazaria hai us par aapke shabad chup ho jaate hai? shayad aapko buraa lage par sach yah hai ki ham ek tarfaa soch pale baithe hai. dharm grantho se lekar aaj tak hamne naaree kaa sammaan karnaa nahee seekhaa naa hamne apne aapko us kaabil banaayaa ki naaree ko char deevaree me band kar uskaa bharan poshan ho sake. yahee naaree maa hai bahin hai betee hai, bhabhi hai.jab koi hamaree bahin betee ko chhedtaa hai to waakee samaaj kee aankhe band ho jaatee hai or jab khud par naubat aatee hai to chillanaa shuru kar dete hai. ek uddhaharn de rahaa hun city bus me mahilao kee seat reserv hai yadi aap us par baith gaye hai yadi mahilaa aa gayee to uthne me aapko mushkil hogee kuchh naa kuchh comment ke saath hee uthenge. yaanee aapoko unkee reserv seat se aapati hogee. bahee jab aap apnee maa betee or bahin ke saath honge to aapko mahilaa seat kee jururat hogee or aap haq se maang karenge ki please yah mahilaa seat hai khade ho jaaiye. yahaan bhee hamaraa samaaj or dharmguru or aapke parivaar kee seek hee ko dosh jaataa hai ki nazariyaa sankuchit hai. aaj balaatkaar kee ghatnaaye aam ho chalee hai par kaanun itnaa lacheelaa hai ki sazaa ho hee nahee saktee yaa dhara 376 se sedhe sachche aadmi ko daryaa jaa saktaa hai it darindo ko nahee. kyaa chhote kapdo me nahee hai unke saath balaatkaar nahee hotaa. yadi aap shahro kee bat chhod de village me to chote kapde nahee hote phir bhee koi naa koi davang havas kaa shikar banaataa hai aakhir kyo?
haan yah theek haia talaa (lock)lagaanaa jaruree hai choree rokne ke liye par aadmi kee soch me bhee parivartan kee jarurat hai. jav ham kisee mataa mandir me jaate hai to betio me maa ke darshan ho jayaa karte hai par ghar me betee nahee chahiye uske liye altrasound karaa kar beteiyaa garbh me hee khatam kar dee jaatee hai. saas yadi bahu ko jindaa jalaatee hai to bhul jaatee hai wah bhee kabhee bahu ban kar is ghar me aayee thee?
sochiye yadi aap naree ke rup me hai aapko kaam par jaanaa hai to kis kis darinde se paalaa padegaa ? sateek vichar hai par ektrafaa?
masum ji abhivadan,
aapke blog par lagataar chote chote kapdo or maa kaa dudh naa pilaanaa chhayaa rahaa.
yadi mahilaa chhote papde pahan rahee hai to kiskee marzee se uskaa bhee maa baap hogaa. phir yadi ham numaayas dekhnaa hee pasand naa kare to phir numaayas bekar jayegee ya jo chhote kapde banaa rahaa wah kyaa soch kar banaa rahaa. iskaa matlab yah nahee ki jo cheez khubsurat hai usko nast kardo. yaa uskee jindgee barbaad kardo. haan yah sach hai talaa lagaa kar chalo. ham sabko pataa hai ki talaa sareefo ke liye hai naa ki choro ke liye chor to talaa tod kar hee choree karte hai. yah sareefo ke liye hai ki unkee niyat naa badal jaaye. sahee sheershak "azar tumharee buree hai or burkhaa me pahnu"
कपड़ो की वजह से समाज में अपराध नहीं बढ़ रहे हैं लेकिन शालीनता बहुत जरूरी है जो होनी ही चाहिए..चाहे पहनावे में ही क्यों न हो....
बहुत बढ़िया आलेख...
अर्थपूर्ण सुन्दर प्रस्तुति
जहाँ पिछले कुछ महीनों से वो अपनी छह साल से गायब बेटी लक्ष्मी को ढूँढ़ने के लिए प्रशासन के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.
उनके पास ना ही मीडिया का साथ है, ना ही प्रदर्शनकारियों की फ़ौज. बस बेटी की छोटी सी तस्वीर बाहर टाँग रखी है
सवाल उठता है कि इस यह गरीब की बेटी लक्ष्मीको तलाशने के लिए कौन सी महिलाएं मोर्चा निकालेंगी और कब?
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kyaa jis samay aur dharnae aur pradarshan hotey haen us samay bhi aesa hi kuchh puchha jaataa haen ???
us jagah to aaye din morchae nikale hi jaatey tab ye prahsn kyun nahin uthtey haen mahila kae pradarshan par muddae ko kyun bhatkayaa jaataa haen
रचना जी चलिए यह तो फैसला हो गया कि यदि एक मुद्दे पे बात हो रही हो और उसमें उसी से मिलता जुलता कोई और मुद्दा उठाया जाए तो उसे भटकना कहते हैं. :)
वैसे भी गरीब कि महिलाओं के साथ ही हिंदुस्तान मैं यौन हिंसाएँ अधिक हुआ करती हैं और वो ग़रीब पहनने के लिए कपडे ले आयी यही बहुत है उत्तेजक कपडे कहाँ से लेगा यह सब तो अमीरों का शौक है.
मामला पश्चिमी सभ्यता को लाने और हिन्दुस्तानी सभ्यता को नकारने का है यह सब बेशर्मी मोर्चा.
लक्ष्मी भी औरत है और जब लड़ा जाता है सभी महिलाओं के लिए लड़ा जाता है .गरीब के ज़ुल्म का शिकार महिलाओं के लिए कौन लडेगा?
shailandra सिंह @ आप ने जो भी बातें या सवाल उठाये हैं उन सभी को मैं खुद अपने पहले वाले लेखों पे उठा चुका हूं और पोल ने नतीजा भी दिया है.
यह उत्तेजक कपडे तो केवल अपरिपक्व नौजवान को गुमराह करते हैं लेकिन असल बलात्कारी बडंग और ताक़तवर लोग हैं और उनका शिकार अक्सर वो ग़रीब हुआ करते हैं जिनके पास ४ जोड़े कपडे हो जाएं पहनने को तो बड़ा काम है . कहाँ उत्तेजक कपडे उनको नसीब?
यह जो असल शिकार हैं यौन हिंसा के इनके हक के लिए कोई नहीं लड़ता?
सत्य यही है कि यह सब बड़े लोगों के बड़े शौक हैं यौन हिंसा का मुद्दा तो एक बहाना है.
और यह तो इंसान कि फितरत है कि खुद का दर्द बड़ा लगता है दूसरों का दिखता ही नहीं.आप ने शायद यह ध्यान नहीं दिया जो पुरुष या महिलाएं इस ब्लॉगजगत मैं भी महिलाओं के उत्तेजक कपड़ों के हिमायती हैं वो भी अपने माँ बहन और बेटियों को ऐसे किसी बेशर्मी मोर्चे मैं नहीं भेजते.
यदि सभी एक साथ इन यौन हिंसा के अपराधियों के खिलाफ एक साथ हो जाएं तो यह खुद ही कम हो जाएंगी. ९९.०९% मर्द यह अपराध नहीं करता.
बेशर्मी मोर्चा ! सच है बड़े लोगों के बड़े शौक। आप के सभी लेख इस विषय पे कामयाब रहे। आभार
maasum bhaai so sunaar ki aek luhaar ki nfrt me amn ka pegaam aese hi hota hai
ये जो आप बार बार पोल की बात कर रहे हैं ये पोल का तरीका तकनीक का खेल हैं
एक इस आईपी से ब्रोव्सेर बदल कर जितनी बार चाहो वोट दिया जा सकता हैं
और रह गयी बात मुद्दा भटकाने की तो सच्चाई आप ने खुद बयान कर दी हैं
की यौन शोषण गरीब औरतो को ज्यादा होता हैं यानी यौन शोषण के लिये कहीं भी कपड़े जिम्मेदार नहीं हैं
गरीब औरतो में शिक्षा की कमी हैं और वो ये मान कर चलती हैं की क्युकी वो स्त्री हैं इस लिये यौन शोषण होगा ही
यौन शोषण , जेंडर बायस और बलात्कार , इन तीन बातो को कभी भी कहीं भी कहो बात को औरत के कपड़ो पर ले जाया ही जाता हैं और औरत को खुद ही इसका जिम्मेदार बता दिया जाता हैं
आप को एक हफ्ते पहले तक सलट मार्च के पता भी नहीं था और मेरे कमेन्ट के बाद आप ने मुझ से ही इसकी जानकारी मांगी थी और आज आप मुझे ही समझा रहे हैं की मै मुद्दा भटका रही हूँ
क्या ऐसा तो नहीं हैं की मेरी देखा देखी कही और भी नारी भी समानता की बात ना करने लगे
आज तो भारतीये नारी ब्लॉग पर भी इसका समर्थन देख कर अच्छा लगा .
रचना जी पोल के नतीजे ९७% सही हैं और सभी पोल बंद हो जाने दें तो मैं खुद बताऊंगा कि कितने बोगस वोट पड़े ,आप इत्मीनान रखें. वैसे आप ने कितनी बार वोट दिया? :)
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रचना जी आप पोस्ट पूरी पढ़ती नहीं हैं और लगती हैं दाना दन फएरिंग करने . उत्तेजक कपडे नौज्वाओ या अपरिपक्व नौजवानों को बलात्कार कि और अधिक ले जाते हैं.
यह जो ग़रीबों का यौन शोषण होता है यह दबंग किस्म के ताक़तवरों का काम है और इस,मैं औरत परदे मैं हो या बेपर्दा सब ठीक बस औरत होना चाहिए.
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समानता ? क्या सच मैं कोई औरत मर्द के सामान अप ने आज तक देखी है? :)
औरत को बराबरी का हक दिया जाता है समन्ता का नहीं.
औरत हया है और हया ही सिखाती है , ‘स्लट वॉक‘ के संदर्भ में
औरत हमारी मां है, हमारी बहन है और हमारी बेटी है। एक औरत ही हमारी अर्धांगिनी होती है। बचपन में जब हम नंगे घूमते हैं तो एक औरत ही हमें सिखाती है कि बेटा नंगे मत घूमो। एक औरत ही यह बात मर्द बच्चे को बताती है और अपना हक़ मानती है। वह कभी नहीं सोचती कि यह तो नर बच्चा है, हम तो औरत हैं इसे क्यों बतायें कि इसे क्या पहनना है और क्या नहीं ?
एक औरत ही अपनी बेटी को तन के साथ सिर ढकना भी सिखाती है। एक औरत ही बताती है कि लड़की के कपड़े लड़कों के कपड़ों से अलग होने चाहिएं।
इसी को हम सभ्यता और संस्कृति कहते हैं। यह हमें मां सिखाती है जो कि एक औरत होती है। बच्चे की पहली पाठशाला उसकी मां होती है। बचपन में एक मां अपने बच्चे को जो कुछ सिखा देती है वह उसके दिलो-दिमाग़ से कभी निकल नहीं पाता। आज लोग कपड़े पहनते हैं और सार्वजनिक रूप से उतारने को बेशर्मी मानते हैं और यह लोगों के मन में इतनी गहराई तक जमा हुआ है कि जो लोग प्रचार पाने के लिए ऐसा फूहड़पन करते भी हैं तो इसे वे भी ‘बेशर्मी‘ ही मानते हैं और ऐसी वॉक को ‘बेशर्मी की चाल ‘ ही कहते हैं। भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इसे बेशर्मी ही माना जाता है जिसे ‘स्लट वॉक‘ का नाम दिया गया है। नंगापन पश्चिमी संस्कृति नहीं है। नंगेपन को पश्चिम में भी बुरा ही माना जाता है। नंगापन बाज़ारवाद की देन है। मुनाफ़ाख़ोर व्यापारियों ने अपना माल बेचने के लिए ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए नारी देह का इस्तेमाल किया और फिर उसे सुनियोजित ढंग से जीवन के एक दर्शन के तौर पर पेश किया। नादान लोग उसकी चपेट में आ गए।
जीवन और जगत को सतही ढंग से लेने वाले इन्हीं बाज़ारवादी पूंजीपतियों के हित साधन करने के लिए पश्चिमी सभ्यता का नाश करने के बाद अब भारतीय नैतिकता पर प्रहार कर रहे हैं। हरेक धर्म-मत के नर-नारी इन्हें एक आवाज़ होकर धिक्कार रहे हैं। इन्हें धिक्कार तो रही है ख़ुद इनकी आत्मा भी लेकिन सवाल है कॉन्ट्रेक्ट का। लोग पेट की ख़ातिर जुर्म तक कर डालते हैं, हो सकता है कि इन्हें भी इनकी मजबूरियां और इनकी ज़रूरतें या फिर इनकी हवस तन के कपड़े उतारने के लिए मजबूर कर रही हो।
औरत बहरहाल साक्षात हया होती है। किसी मजबूरी में ही वह बेहया होती है। जैसे हम वेश्याओं के बारे में सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हैं, ऐसे ही ‘स्लट वॉक‘ में शामिल औरतों के बारे में भी हमें हमदर्दी के साथ उनकी पृष्ठभूमि जानने की ज़रूरत है।
जल्दी में हमें औरतों को कुछ भी बुरा नहीं कहना चाहिए।
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भारतीय सभ्यता और संस्कृति यौन हिंसा का पाठ नहीं पढ़ाती बल्कि महिलाओं की इज्ज़त करना सिखाती है"
एक दम सटीक विचार आपका आभार
मासूम जी
नमस्कार
पहनावा चाहे जैसा भी हो शालीनता होनी चाहए
उत्तेजक कपडे ही तो नौजवान को गुमराह करते हैं इसी वजह से रेप की घटनाये बढ़ रही है
....अच्छे आलेख के लिए बधाई.
महिलाओं के प्रति लोगों के नजरिए में और व्यवस्था में परिवर्तन जरूरी है। क्या पुरुष ही हैं, जो लड़कियों की ड्रेसेज पर आपत्ति करते हैं या फिर फब्तियां कसते हैं? अगर आपका जवाब हां है, तो सॉरी! अगर आप सिर्फ उन्हें ब्लेम कर रही हैं, तो फिरआप ने क्या किया ?????????????
बलात्कार करने वाला औरत के वस्त्र नहीं देखता ....
दूसरी बात अकड़े बताती है की जिन लडकियों का जिंह हुआ है उनमे अधिकतर बचिया थी गरीब व मध्यम वर्गी परिवार की या गाँव की
India: 0.0143187 per 1,000 people
NEW DELHI: The noise being generated about recent incidents of rape in Uttar Pradesh might make it seem like the state is particularly bad when it comes to this most heinous of crimes against women, but official data suggests quite the contrary. In fact, UP has among the lowest rates of rape among all major states in India.
The National Crime Records Bureau's publication Crime in India 2009 — the latest edition of that annual report — shows that with 1,759 rape victims in 2009, UP had 0.9 rape victims per lakh population. Compare that with the 1,631 victims in a much smaller state like Assam, which means a rate of 5.3 rape victims per lakh population, almost six times the rate in UP.
The five best states or UTs in 2009, among those with a population of 100 lakh or more, were Gujarat, Karnataka, Tamil Nadu, UP and Bihar in that order, all of them having less than one rape victim per lakh population.
काफी विचारणीय लेख है.
मासूम भाई,
तीस साल पहले अमिताभ की फिल्म आई थी दोस्ताना...उसमें अमिताभ ज़ीनत अमान से कहते हैं, अगर घर खुला रखोगे तो चोर-लुटेरे तो आएंगे हीं...
जय हिंद...
मैं स्लट वाक् -छिनाल मार्च जैसे प्रदर्शनों को भारतीय परिवेश के अनुकूल नहीं मानता -सेक्स वर्कर्स ऐसा कुछ करें तो बात समझ में भी आती है -मगर वे ऐसा क्यों करेगीं -अपनी जीविका के खिलाफ -ये चोचले संस्कृति और संस्कार से कटी अभिजात्य वर्ग की ललनाओं का हो सकता है -!
आपकी बात से पूर्णत: सहमत हूँ मासूम भाई... बल्कि खुशदीप भाई और अरविन्द मिश्र जी की टिपण्णी को भी मेरी ही टिपण्णी माना जा सकता है...
All participants reported a reduced desire movements and exercise making faces.
In addition, the Affected role breathing, or impression from the pain sensation
of insomnia. We hope that the proposed written report names of each of the
deadened were read out loud. The Parkinson's Disease club, which funded the original the new study demonstrates that NPT001 disrupts alpha-synuclein fibrils which are thinking to spiel a decisive part in PD.
my blog - Parkinson's disease specialists Minneapolis
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