Thursday, May 24, 2012

ब्लॉगजगत कब तक सोता रहेगा ?

DSC00439हमारे समाज को बनाने में ऐसे लोगों की भूमिका हमेशा से अहम रही है जो लोगों को सत्य और असत्य , सही और गलत ,बुरा और अच्छे का फर्क समझाते रहते हैं | यदि ऐसा न हों तो इस समाज में लोगों का अमन और चैन से रहना मुश्किल हों जाए | एक बच्चा जब बड़ा होता है तो अपने बड़े बूढों से सुन के सीखता है, चोरी करना गलत है, झूट न बोलो, किसी का  हक न मारो और जब वो बड़ा हों जाता है समाज में उठने बैठने लगता है तो समाज के लोगों को बुराईयों के खिलाफ अभियान चलाते देख के सही और गलत का अंतर सीखता है | इसके साथ साथ वो समाज के कानून को भी जानने लगता है जहाँ से गलत काम करने वालों को कैसे रोका जा सकता है यह सीखता है |

 

आज हम जिस समाज में रह रहे हैं वहाँ एक नया नियम देखने को मिलने लगा है कि जिसे जो करना है उसे करने दो तुम अपनी दुनिया में खुश रहो | कोई चोरी कर रहा है तो करने दो, कोई जालसाज़ी कर रहा है तो करने दो ,कोई बेवकूफ बना के लोगों को लूट रहा है तो लूटने दो| हमसे क्या लेना देना | लोगों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लूट और जालसाजी के खिलाफ जागरूकता पैदा करने को अब सही नहीं समझा जाता | और यदि कोई ऐसा करता है तो उसको सहयोग कि जगह नसीहत मिला करती है कि क्यों कूद पड़े झमेले में?  और यही हमारा आज का मिज़ाज इस समाज को और अधिक भ्रष्ट बनाता जा रहा है और इसी कारण लोगों में हक का साथ खुल के देने कि हिम्मत और चाह दोनों खत्म होती जा रही है |

 

यही कारण है कि इस समाज में एक और कोई भूखा सोता है तो वही पास में कहीं लाखों कि पार्टी हों रही होती है जहां खाना खाया कम जाता है और शान दिखा के फेका अधिक जाता है | सड़कों में किसी कमज़ोर को मार खाते देख आज कोई नहीं बचाता | ऐसे पास से निकल जाते हैं जैसे कुछ हों ही न रहा हों और ऐसे में बदमाशों कि हौसलाअफजाई जान बूझ के करते हैं | रिश्तेदारों में भी गरीब या सीधा रिश्तेदार कुछ गलत कर जाये तो सभी लगते हैं नसीहत करने अमीर या दबंग रिश्तेदार की बुराई को भी देख के अनदेखा कर दिया जाता है |

ब्लॉगजगत में भी आप देख सकते हैं कि टिपण्णी पाने कि लालच टिपण्णी करते तो बहुत मिल जाएंगे लेकिन सामाजिक सरोकारों पे लिखी किसी पोस्ट के २-४ से अधिक टिपण्णी नहीं मिला करती | समाज में जो भी हों रहा है हमसे क्या हम कोई पैगम्बर या भगवान के अवतार नहीं हैं | हमें तो केवल अपना फायदा ही देखना है जैसी सोंच समाज के लिए घातक बनती जा रही है|

 

यही कारण है कि चोरों के गिरोह आज बड़े होते और मज़बूत होते जा रहे हैं तथा शरीफों के गिरोह टूटते और कमज़ोर होते जा रहे हैं | धर्म भी अब इस समाज में रहने वालों को सही या गलत बताने में समर्थ नहीं रहा क्योंकि उसपे इमानदारी से चलने वाले अब कम ही रह गए हैं |

हमारा सामाजिक सुरक्षा कवच कमज़ोर होता जा रहा है क्योंकि समाज के सुरक्षा कवच  समाज में रहने वाले वही लोग हैं जो हक और बातिल का अंतर लोगों के बताते रहते हैं और बुराई के खिलाफ निडर  हो के आवाज़ उठाते हैं|

 

यह हर इंसान का पहला धर्म है कि वो सत्य का साथ दे| आप यदि आज इस समाज में रहते किसी मजबूरी के कारण बहुत नेक काम नहीं कर पा रहे हैं तो कोई बात नहीं ,कम से कम नेक काम करने वालों का, हक के लिए आवाज़ उठाने वालों का साथ तो दे सकते हैं और यदि इतना भी नहीं कर पाते हैं तो कम से कम बुराई और गलत काम करने वालों का बेवजह की लालचों में आ के साथ देने से तो खुद को रोक ही सकते हैं |

अभी कुछ दिनों पहले जिओग्राफी चैंनल पे एक प्रोग्राम देख रहा था जिसमे दिखाया जा रहा था कि कुछ हंस दरिया किनारे झुण्ड में अपने अन्डो पे बैठे बच्चे निकलने का इन्तेज़ार कर रहे हैं कि एक कौवा आता है एक हंस को परेशां करके उसे भगाता है फिर उसके अंडे खा जाता है वंही हर २-२ फीट कि दूरी पे हज़ारों हंस के जोड़े बैठे थे लेकिन किसी ने उस कौवे को नहीं रोका | नतीजा यह हुआ कि एक के बाद एक वो कौवा सभी के अंडे खाता गया जब तक कि उसका पेट न भर गया और फिर दूसरा कौवा यही काम करने लगा |

एक कौवा हज़ारों हंस के झुण्ड में जाके उनके अंडे आसानी से इसलिए खा गया इसलिए कि उन हँसो का मिज़ाज यही था कि हमसे क्या मतलब यह तो सामने वाले हंस कि परेशानी है | वो यह भूल गए थे कि उनकी बारी भी आ सकती है |

आज हम भी ऐसे ही समाज का निर्माण करते जा रहे हैं| क्या आप भी ऐसे  हंसों जैसा समाज बनाना चाहते हैं? यदि नहीं तो भ्रष्टाचार और बुराई के खिलाफ आवाज़ उठाना सीख लें वरना आज इसकी बारी तो कल उसकी बारी आएगी |

आपकी लेखनी में यदि दम है तो इसका इस्तेमाल समाज के हित में करें | इस ब्लॉगजगत में खुद की खुशी के लिए लिखने वाले बहुत हैं और ऐसा करने में कोई हर्ज भी नहीं लेकिन मेरा माना है कि सामाजिक सरोकारों से जुडके  हक और सत्य का साथ देने वाले ब्लोगरों की  आवश्यकता आज अधिक है |

Sunday, May 13, 2012

मैं ऐसे किसी इंसान से दोस्ती नहीं करता जिसने ?

 

मानव जीवन में माँ का रिश्ता सभी रिश्तों से ऊपर है | अल्लाह ने भी यह बात कही और आज इस दुनिया का हर इंसान माने या ना माने इस बात को महसूस अवश्य करता है | यदि कोई बदकिस्मत औलाद अपने जीवन काल में इस बात को महसूस न कर सका तो माँ कि म्रत्यु के बाद उसे इस बात का एहसास अवश्य होता है | किसी शायर ने कहा है कि ---

 

जब तू पैदा हुआ कितना मजबूर था ,

यह जहाँ तेरी सोंचों से भी दूर था |

 

smallm1यह माँ है जो एक बच्चे के दुनिया में चलना, रहना, तमीज़ और तहजीब सिखाती है, उसी जीवन कि सख्तियों से लड़ने के काबिल बनाती है और जब यह औलाद बड़ी हो जाती है ,आत्मनिर्भर हो जाती है तो बचपन में जिस मां के साथ सबसे ज्यादा समय गुजारा, उसका साथ अच्छा नहीं लगता | उसकी बातें पुराने ज़माने कि लगती हैं | अब वो औलाद अपने परिवार में अपनी माँ को उच्च स्थान नहीं देना चाहता | हम भूल जाते हैं कि ---

दुनिया में माँ का कोई विकल्प नहीं,
माँ की सेवा से सच्चा संकल्प नहीं |

जब हम बच्चे थे तो हमारे माता पिता उस जगह उस शहर में रहते थे जहां रह के वो हमारी बेहतर परवरिश कर सकें | और जहाँ भी रहे अपनी औलाद को साथ रखते थे | और यही औलाद जब बड़ी ही जाती है तो वो रोज़गार के सिलसिले में माँ बाप से दूर रहने लगती है और जब सुविधा मिलती है अपना घर बना लेने की तो माँ बाप कि जगह अक्सर उसके घर में नहीं हुआ करती | वो गांव में अकेले ,कमज़ोर अपनी औलाद के आने कि राह देखते रहते हैं या बड़े शहरों में किसी वृधाश्रम में डाल दिए जाते हैं | ये कितने दुर्भाग्य की बात है की जिस वक्त हमारे माता पिता को हमारे शारीरिक और भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता होती है उसी वक्त हम उनसे मजबूरी के नाम पे मुह मोड़ लेते हैं |

औलाद इस आसान सी बात को नहीं समझ पाती कि यह वही माँ बाप हैं जिन्होंने कभी उसे उसके आत्मनिर्भर होने से पहले अपने से दूर नहीं किया तो यह आज उसके बिना कैसे रहते होंगे ? यह समझना भी औलाद के लिए मुश्किल हो जाता है कि जब वो कमज़ोर था तो उसके माँ बाप उसका सहारा बने थे ,कभी उसे अकेले नहीं छोड़ते थे ,आज माँ बाप कमज़ोर हुए हैं तो उन्हें अपने साथ रखना भी ज़रूरी है |

हमारी पहचान के एक सज्जन हैं | वो अपनी माँ को साथ नहीं रखते और जब किसी ने सवाल किया तो बोले भाई “ वो अपना जीवन जी चुके ,अपनी ओलाद कि परवरिश कर चुके अब हमें अपना जीवन जीने दो ,अपनी ओलाद की परवरिश करने दो | मैं सोंच रहा था कि उनके अपनी औलाद कि परवरिश में माता पिता कैसे बाधा बन सकते हैं ? हम भूल जाते हैं कि माँ के समान निस्वार्थ प्यार करने वाला दूसरा कोई नहीं होता | काश हम यह बात समझ पाते कि जिसके पास माँ है वो दुनिया का सबसे धनी और खुशकिस्मत व्यक्ति है | काश हम इस धन के खो जाने से पहले इसकी अहमियत को पहचान के उसे अपने घर में अपने दिल में उसका सही स्थान दे पाते |

मैं हमेशा कहा करता हूँ सही इंसान पहचानना है तो यह देखो को वो अपने माता पिता के साथ कैसा है | क्यों कि जो अपने माँ बाप का न हुआ वो आप का और हमारा क्या होगा? ऐसा इंसान जो अपने माता पिता कि इज्ज़त न करे, उनका सहारा न बने ,वास्तविक जीवन में एक खुदगर्ज़ इंसान होता है जो सबसे फायदा तो लेता है लेकिन कभी उनका सच्चे दिल से शुक्रिया नहीं अदा करता |

इसी लिए मैं ऐसे किसी इंसान से दोस्ती नहीं करता जिसने अपने माता पिता कि कद्र न कि हो ... क्यों कि जो अपने माँ बाप का न हुआ वो आप का और हमारा क्या होगा?

यह तो थी कुछ बातें कुछ सवाल जो मेरे दिल में अक्सर उठते रहते हैं लेकिन यह एक बड़ा सवाल है कि क्या आज के युग में अपने बूढ़े माँ बाप को साथ रखना संभव है ?

Friday, May 11, 2012

कहाँ थमेगा सचिन के विजय रथ का कारवां ?


आज ही मैंने आप सब के सामने जौनपुर के एक जज डॉ दिलीप कुमार सिंह के बारे में बताया | ईमानदारी कि ऐसी मिसाल आज भ्रष्टाचार के युग में देखने को नहीं मिलती | भाई  राजेन्द्र स्वर्णकार  जी ने अपनी टिपण्णी में लिखा कि “इनके लेखन की बानगी भी यहां देते तो और अच्छा लगता” और मुझे अपनी इस गलती का एहसास हुआ |

डॉ. दिलीप सिंह जी के लेखों और कविताओं से वे सभी परिचित हैं जो पूर्वांचल के अखबार पढ़ा करते हैं | उनके लेख ज्ञानवर्धक और रोचक हुआ करते हैं जिनको एक बार इंसान पढ़ना शुरू करे तो उत्सुकतावश अंत तक पढता ही चला जाता है |


 डॉ दिलीप सिंह ज्योतिषीय और ज्योतिर्विदीय गणनाओं में माहिर हैं देखिये इसका एक नमूना उनके ही लेख कहाँ थमेगा सचिन के विजय रथ का कारवां के कुछ अंशों में | यह लेख डॉ दिलीप जी ने एक महीना पहले  मुझे भेजा था जिसमे कहा गया था कि “अब २०१३ में उनका  संन्यास सुनिश्चित है | तिहरा शतक न लगा सकेंगे तथा व्यापार और राजनीति में चमकेंगे |” राजनीति में चमकने वाली बात आज जब सत्य होती दिखाई पडी तो मुझे इस लेख कि याद आई और आप के सामने पेश है यह लेख |

डॉ. दिलीप अपने लेख “कहाँ थमेगा सचिन के विजय रथ का कारवां” मे लिखते हैं कि “जब क्रिकेट के भगवान सचिन रमेश तेदुलकर ३६८ दिनों से अपने महान सौंवे शतक के लिए १३० करोड भारतियों कि आकांशा के लिए जूझ रहे थे एवं कपिल गांगुली जैसे महान क्रिकेटरों के साथ तमाम छुटभैये क्रिकेटर तथा विश्लेषक उन्हें रिटायरमेंट कि बिन मांगी मुफ्त में  सलाह दे रहे थे| तमाम ज्योतिर्विद उनके सौंवे शतक पे प्रश्न चिन्ह पैदा कर रहे थे तथा उनके ९९ के फेर में ही रह जाने कि अटकलें लगाई जा रही थी तब मैंने अपनी गहन एवं  सूछ्म ज्योतिर्विदीय एवं ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पे पूरे देश विदेश के खेल प्रेमियों एवं सचिन के प्रशंसकों को यह आश्वस्त किया था कि मार्च २०१२ के अंत तक महा मास्टर ब्लास्टर का शतक अवश्य लग जाएगा | हर समाचार पत्रों मैं उनकी कुंडली  भी दी थी साथ मैं यह भी  बिलकुल साफ़ लिखा था कि २०१३ के पहले सचिन संन्यास नहीं लेंगे |


ठीक ३६९ दिन नाकामी का सफर झेलने के बाद लघु विजेता सचिन ने १४७ गेंदों पे १२ चोकों और १ छक्के कि मदद से शानदार ११४ रन कूट डाले तथा मीरपुर बंगलादेश का शेरे बंगाल का स्टेडियम “भारतीय बाघ” कि दहाड़ का गवाह बना | सारा देश खुशी से झूम उठा | सचिन ने अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ  बल्ला लहर  कर भगवान का धन्यवाद करते हुए उठित जवाब दे डाला |

सचिन का महाशातक वेस्टइंडीज दौरे में सुनिश्चित था जिसे छोडकर उन्होंने ने भारी गलती  किया | अब २०१३ में उनका  संन्यास सुनिश्चित है | तिहरा शतक न लगा सकेंगे तथा व्यापार और राजनीति में चमकेंगे |

ज्योतिष के आधारपर इस महानतम खिलाडी की विवेचना करें | २४ अप्रैल १९७३ ई० को विराट नगरी मुंबई में ७२:५० पूर्वी देशांतर तथा १८:५८ उत्तरी अक्षॉस पर धनु राशि एवं सिंह लगन में हुआ | रशिपति व्र्हस्पति, लग्नेश सूर्य दोनों ने सचिन को अटूट आस्थावान कर्मयोगी बना दिया है | इसी से क्षीण भाग्य के पश्चात भी उनका सफर २०१३ से पूर्व तो खत्म होगा ही नहीं | उन्हें खत्म करने वाले स्वम खत्म हो जाएंगे | राहु कि महादशा २०१६ तक है अत: तब तक सचिन का करियर चल सकता है | पर ज्योतिष की भारतीय एवं  पाश्चात्य सभी गणनाओं में यह स्पष्ट है कि चोट-चपेट , षड्यंत्रों इत्यादि के चलते वे २०१४ तक क्रिकेट के सभी प्रारूपों को अलविदा कह  देंगे |

वे ५००-५५० एक दिनी टेस्ट खेल कर २०-२२ हज़ार रन ५१-५७ शतक १००-१०५ अर्धशतक बना सकते हैं जबकि २००-२१० अधिकतम टेस्ट खेल कर ५३-६० शतक एवं ६५-७० अर्धशतक सहित १८-२० हज़ार रन कूट सकते  हैं. एक दिनी में २०० से ज्यादा रन और टेस्ट में ३०० से ज्यादा रन वो नहीं बना पायेंगे | छक्कों का कीर्तिमान ,सबसे तेज शतक,अर्धशतक,टेस्ट एवं एक दिनी में,एक ओवर में सर्वाधिक रन, कैचों और छक्कों का रिकार्ड सबसे ज्यादा समय खेलने का रिकार्ड तथा कुछ अन्य उनकी पहुँच से सदा दूर रहेंगे |

Dr. Dileep Kumar Singh
Juri Judge, Member Lok Adalat,DLSA, Astrologist,Astronomist,Jurist,Vastu and Gem Kundli Expert.


Thursday, May 10, 2012

एक जज ऐसा भी

इस बार  अपने वतन जौनपुर में काफी दिन रहा और जौनपुर के बहुत से प्रतिभाशाली लोगों से मिलने का अवसर मिला.


कभी कभी जीवन में ऐसे लोग मिल जाते हैं जिनसे मिलने के बाद विश्वास ही नहीं होता की ऐसे लोग भी होते हैं. आज हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां भ्रष्टाचार एक रिवाज बन चुका है.इस बार ऐसे ही समाज में रहने वाले एक ज्ञानी और प्रतिभाशाली जूरी जज डॉ दिलीप जी से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ. डॉ दिलीप के बारे में जितना कहा जाए कम लगता है. बचपन से ही प्रतिभाशाली डॉ दिलीप की लेखनी और इनका ज्योतिष का ज्ञान भी अतुलनीय है.
  अभी मैं इनके ज्ञान और प्रतिभाओं को देख के अचंभित हो ही रहा था कि एक दिन उनके घर जाने का अवसर प्राप्त हुआ और जब घर पहुंचा तो सोंचने पे मजबूर हो गया की क्या में सचमें किसी जूरी जज के घर  में हूँ?
ऐसा लगता था में किसी मजदूर की छोटी सी कुटिया में बैठा हूँ. जहां एक तरफ भगवन जी विराजमान थे और दूसरी तरफ बैठने के लिए कुछ कुर्सियां.
सादगी और ईमानदारी कि ऐसी मिसाल बहुत कम ही देखने को मिलती है और जौनपुर के डॉ दिलीप सिंह (जूरी जज ) ने यह दिखा दिया कि ईमानदारी के साथ आज के युग मैं भी जिया जा सकता है बस आवश्यकता है अपनी इच्छाओं को अधिक बढ़ने से रोकने की |
डॉ दिलीप सिंह बचपन से ही बड़े प्रतिभाशाली रहे हैं
Dr. Dilip K Singh
Dr. Dileep Kumar Singh
Juri Judge, Member Lok Adalat,DLSA, Astrologist,Astronomist,Jurist,Vastu and Gem Kundli Expert.

Wednesday, May 9, 2012

चलो बहती गंगा में हाथ मैं भी धो लूँ |


चलो बहती गंगा में हाथ मैं भी धो लूँ |

इस सत्य  को सभी मानते हैं जिस चीज़ की इंसान को आवश्यकता होती है वो उसी कि तलाश में लगा रहता है | पहले सीधे रस्ते से उस चीज़ को पाने कि कोशिश किया करता है फिर गलत रास्ते भी अपना लेता है | हाँ बहुत से लोग सब्र करके  गलत रास्ते पे खुद को जाने से  रोक भी लिया करते हैं | यह समाज के अच्छे लोग हुआ करते हैं जिनकी संख्या दिन- ब- दिन कम होती जा रही है |
कोई भूखा है तो खाने कि तलाश किया करता है | पहले कमा  के खाने की  चीज़ें खरीदता है और अपनी ज़रूरत पूरी करता है | कमा  न सका तो मांग के पेट भरने कि कोशिश करता है और यदि मांगने पे भी न मिला तो चोरी करता है या सब्र कर के भूखा सो जाता है | खाना अक्सर १-२ दिन में मिल ही जाता है और न मिले तो म्रत्यु निश्चित है |
 जैसे शरीर में खाने कि भूख होती है वैसे ही शरीर में सेक्स को भी भूख होती है | इसकी भी एक उम्र होती है | कुछ साल तो ऐसा युवा अपने को दूसरी बातों में मसरूफ रख के इसे रोक पाता है क्यों कि उस समय यह भूख उतनी तेज नहीं होती लेकिन एक उम्र आ जाती हैं जब इसे रोकना  आसान नहीं हुआ करता |ऐसे में इंसान फितरत के अनुसार अपनी इस भूख को मिटाने  के रास्ते तलाशना शुरू कर देता है |
आज के युग में शादियाँ होती हैं देर से और युवा को कम से कम १० -१५ वर्ष इस भूख को सहन करना पड़ता है | लोग अजीब अजीब हल निकल लेते हैं इस भूख को खत्म करने का और इन्तेज़ार किया करते हैं कब उनको भी एक साथी मिले | आज के खुले माहौल में युवाओं से यह आशा करना कि वो सब्र करेंगे बेवकूफी के सिवाए कुछ भी नहीं है | हाँ बहुत से ऐसे हैं जो सब्र करते हैं और सही वक्त का सालों इन्तेज़ार कर लिया करते हैं | ऐसे लोगों कि संख्या दिन- ब -दिन अब कम होती जा रही है |आज के खुले माहौल में तो यह और भी मुश्किल होता जा रहा है |
इसका कोई हल हमें निकलना तो चाहिए | हाथ पे हाथ धरे बैठने से या यह तय कर लेने से  कि हमें तो सेक्स कि  आवश्यकता पूरी करने के लिए अधेड उम्र में भी एक पत्नी चाहिए लेकिन हमारी जवान ओलादों को इसकी आवश्यकता नहीं | वो सब्र करेंगे जैसे ख्यालात  समस्या से भागने के सिवाए कुछ भी  नहीं है | समस्या से भागने से समस्या हल नहीं हो जाती और न ही उससे सच झूट में बदल जाता |
आज हमारे  समाज के बुज़ुर्ग और युवा दोनों इसी  समस्या का हल न तलाश पाने के कारण परेशान रहते हैं और एक दुसरे पे ऊँगली उठाते  और एक दुसरे की  शिकायत करते नज़र आते हैं |
बहुत से नौजवान आपस में दोस्ती के नाम पे शारीरिक सम्बन्ध बना लेने को बुरा नहीं समझते लेकिन हमारे समाज में अपनी सेक्स की भूख मिटाने  का यह रास्ता जो एक दुसरे कि मर्ज़ी से तो है ,सही नहीं समझा जाता और इसी भी चोरी का नाम उन युवाओं के माता पिता देते हैं |
अक्सर माता पिता भी ऐसे रिश्ते को समझते हुए अनदेखा तो कर देते हैं लेकिन अपनी सहमति भी नहीं देते | ऐसे में अक्सर बड़ी बड़ी समस्याएं पैदा हों जाया करती हैं | क्या यह सच से भागने जैसा नहीं है ?
यह समस्या केवल जवानी में ही नहीं आती है बल्कि यह समस्या हर उस समय पैदा हों सकती है जब जीवन साथी न हो और शरीर सेक्स की  मांग कर रहा हो | इसलिए यह समस्या शादी के बाद भी आती है जब पति या पत्नी एक दुसरे को संतुष्ट न कर पा रहे हों | यह समस्या जवान विधवा के भी साथ आया करती है जिसे समाज सब्र कि सिवाए कोई रास्ता  नहीं देता | और यह समस्या तलाक के बाद भी आया करती है | शरीर कि भूख को शांत करने का हल हर हाल में मिलना ही चाहिए ऐसा मेरा मानना  है |

आप कि नज़र में इसका क्या हल है? या यह कोई समस्या ही नहीं है |